नई दिल्ली | भारत-चीन सीमा पर वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख में जो घटनाक्रम सामने आया, वह केवल एक सैन्य टकराव की स्थिति नहीं थी, बल्कि भारत की रणनीतिक परिपक्वता, राजनीतिक विवेक और सैन्य अनुशासन की निर्णायक परीक्षा थी। दुर्भाग्यवश, आज उसी संवेदनशील दौर को लेकर अधूरी और अपुष्ट जानकारियों के आधार पर संसद और सार्वजनिक विमर्श में विवाद खड़ा किया जा रहा है।
पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे से जुड़ी एक अप्रकाशित पुस्तक और एक अख़बारी लेख के कथित अंशों के आधार पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा यह आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री ने निर्णय लेने में “दो घंटे” लगाए, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता था। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह टिप्पणी सैन्य निर्णय-प्रक्रिया की बुनियादी समझ के अभाव को दर्शाती है।
पूरा मामला पूर्वी लद्दाख के कैलाश पर्वत श्रृंखला में स्थित रेचिन-ला दर्रे से जुड़ा है। यह वही क्षेत्र है, जहां भारतीय सेना पहले ही सामरिक ऊँचाइयों पर नियंत्रण स्थापित कर चुकी थी।
31 अगस्त 2020 की रात करीब सवा आठ बजे, भारतीय अग्रिम चौकियों ने देखा कि चीनी सैनिकों के साथ चार टैंक भारतीय पोज़िशनों की ओर बढ़ रहे हैं।
इसी दौरान चीन की ओर से बातचीत का प्रस्ताव भी सामने आया—जो उसकी पुरानी रणनीति का हिस्सा रहा है:
एक ओर सैन्य दबाव
दूसरी ओर संवाद का भ्रम
स्थिति की जानकारी तेजी से सैन्य कमांड चैनल के माध्यम से ऊपर पहुंची। उत्तरी कमान के सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी से होते हुए यह मामला सेना प्रमुख और फिर रक्षा मंत्री तक गया।
करीब रात 10 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय से स्पष्ट निर्देश मिला—
“स्थिति का आकलन करिए, आप जो उचित समझें, वही कीजिए।”
यह आदेश किसी प्रकार की हिचक या देरी नहीं, बल्कि सेना को पूर्ण परिचालनात्मक स्वतंत्रता देने का राजनीतिक संकेत था।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रधानमंत्री कोई अग्रिम मोर्चे पर खड़े अधिकारी नहीं होते। उन्हें निर्णय लेते समय—
सैन्य स्थिति
कूटनीतिक प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
और परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी के साथ संभावित परिणाम
सभी पर विचार करना होता है। ऐसे में विवेकपूर्ण निर्णय ही राष्ट्रहित में होता है।
“आप जो उचित समझें, करें” — यह वाक्य सेना पर सर्वोच्च विश्वास का प्रतीक था, न कि कमजोरी का।
रेचिन-ला और आसपास की ऊँचाइयों पर भारतीय सेना की मज़बूत स्थिति ने चीन को रणनीतिक झटका दिया था। टैंकों की गतिविधि युद्ध की घोषणा नहीं, बल्कि दबाव बनाने का प्रयास थी।
भारतीय सेना ने न केवल इस दबाव को संतुलित तरीके से संभाला, बल्कि चीन को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत न झुकेगा, न उकसावे में आएगा।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चीन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपुष्ट तथ्यों के आधार पर बयानबाज़ी राष्ट्रीय एकजुटता को नुकसान पहुंचाती है। जब कोई पुस्तक प्रकाशित ही नहीं हुई, तो उसके कथित अंशों के आधार पर संसद में बहस करना संस्थागत मर्यादाओं के विपरीत है।
रक्षा मंत्री और गृह मंत्री ने भी संसद में साफ कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अनुमान नहीं, प्रमाण ज़रूरी होते हैं।
रेचिन-ला की उस रात ने यह साबित कर दिया कि भारत ने
युद्ध भी टाला
अपना प्रभुत्व भी बनाए रखा
और चीन को स्पष्ट संदेश भी दिया
यह किसी प्रकार की कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व राजनीतिक नेतृत्व और पेशेवर सेना की जीत थी।
राष्ट्र सुरक्षित रहा, सेना सतर्क रही और नेतृत्व जिम्मेदार रहा—यही उस रात की असली कहानी है।
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