दौसा। जिले में राजीविका की पहल से शुरू हुआ सॉफ्ट टॉय बैंक आज ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुका है। इस पहल ने न केवल महिलाओं को घर बैठे रोजगार दिया, बल्कि कम पूंजी में अधिक मुनाफा कमाने वाला एक सफल मॉडल भी तैयार किया है। रंग-बिरंगे टेडी बियर और गुड्डे-गुड़िया बनाकर महिलाएं अब सिर्फ खिलौने नहीं बना रहीं, बल्कि अपने और अपने परिवार के भविष्य को भी संवार रही हैं।
यह बदलाव जिला कलेक्टर के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से संभव हो सका। राजीविका के माध्यम से जिले की स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को संगठित कर उन्हें सॉफ्ट टॉय निर्माण से जोड़ा गया।
सॉफ्ट टॉय निर्माण ऐसा व्यवसाय है, जिसमें लागत और जोखिम दोनों कम हैं, जबकि कमाई की संभावनाएं काफी अधिक हैं। इसमें पॉलिस्टर (60 से 80 रुपए प्रति किलो), फर क्लॉथ (करीब 300 रुपए प्रति मीटर), प्लास्टिक की आंखें, नाक, बटन और रिबन जैसी सामग्री का उपयोग किया जाता है। महिलाएं इस काम को आसानी से घर बैठे कर पा रही हैं।
राजीविका द्वारा दौसा ब्लॉक की स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं का चयन किया गया। इन्हें आर-सेटी के माध्यम से 10 दिवसीय प्रशिक्षण दिलवाया गया, जिसमें सॉफ्ट टॉय बनाने की तकनीक, गुणवत्ता और पैकेजिंग की जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण पूरा होते ही महिलाओं को महवा ब्लॉक की 211 आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए बच्चों के खेलने हेतु 200 पैकेट सॉफ्ट टॉय का पहला ऑर्डर मिला।
खुर्रा कलां गांव में संचालित जोबनेर माता स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने यह ऑर्डर मात्र 15 दिनों में पूरा कर दिखाया।
पहले ऑर्डर के लिए
74,500 रुपए का कच्चा माल खरीदा गया
क्लस्टर लेवल फेडरेशन से 1.04 लाख रुपए की राशि ली गई
29,500 रुपए का शुद्ध लाभ हुआ
पहली सफलता के बाद महिलाओं को
दौसा ब्लॉक की 250 आंगनबाड़ियों के लिए 1,000 सॉफ्ट टॉय का दूसरा ऑर्डर मिला
इसमें भी 29,500 रुपए का शुद्ध लाभ हुआ
इसके बाद बसवा ब्लॉक और बांदीकुई पंचायत समिति से भी समान ऑर्डर मिले। चारों ब्लॉकों के ऑर्डर पूरे कर अब तक महिलाएं 1.18 लाख रुपए का शुद्ध लाभ कमा चुकी हैं।
सॉफ्ट टॉय बैंक की सफलता की चर्चा अब पूरे प्रदेश में फैल चुकी है। वर्तमान में
सिकंदरा, बैजूपाड़ा, लालसोट, रामगढ़ पचवारा, लवाण, नांगल राजावतान और सिकराय ब्लॉकों से
कुल 9,000 सॉफ्ट टॉय (180 पैकेट) के नए ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं।
राजीविका द्वारा संचालित सॉफ्ट टॉय बैंक ने यह साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएं भी सफल उद्यमी बन सकती हैं। यह मॉडल न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे रहा है।
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