गगनयान मिशन में DRDO की बड़ी कामयाबी! ड्रोग पैराशूट टेस्ट सफल, अब अंतरिक्ष उड़ान एक कदम और करीब

नई दिल्ली: गगनयान मिशन ड्रोग पैराशूट क्वालिफिकेशन टेस्ट भारत के पहले मानवीय अंतरिक्ष अभियान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation) यानी DRDO ने इस महत्वपूर्ण परीक्षण को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

यह परीक्षण चंडीगढ़ स्थित Terminal Ballistic Research Laboratory (TBRL) की अत्याधुनिक रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) फैसिलिटी में किया गया। इस सफलता को भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है।

ISRO और DRDO की संयुक्त उपलब्धि

इस अहम टेस्ट को Indian Space Research Organisation (ISRO) के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) और DRDO के एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिश्मेंट (ADRDE) की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया।

ड्रोग पैराशूट किसी भी मानवीय अंतरिक्ष मिशन में बेहद अहम भूमिका निभाता है। यह अंतरिक्ष कैप्सूल की रफ्तार को नियंत्रित करने और सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करने के लिए शुरुआती चरण में खुलता है। ऐसे में इसका क्वालिफिकेशन टेस्ट मिशन की सुरक्षा से सीधे तौर पर जुड़ा होता है।

हाई-स्पीड RTRS फैसिलिटी में हुआ परीक्षण

रेल ट्रैक रॉकेट स्लेड (RTRS) एक विशेष टेस्टिंग सुविधा है, जिसका उपयोग हाई-स्पीड एयरोडायनामिक और बैलिस्टिक परीक्षणों के लिए किया जाता है।

18 फरवरी 2026 को किए गए इस डायनामिक टेस्ट में अधिकतम फ्लाइट लोड से भी ज्यादा भार का सिमुलेशन किया गया। 19 फरवरी 2026 को इसकी आधिकारिक जानकारी साझा की गई।

विशेषज्ञों के मुताबिक, क्वालिफिकेशन स्तर पर सफल परीक्षण यह दर्शाता है कि पैराशूट का डिजाइन मजबूत है और उसमें अतिरिक्त सेफ्टी मार्जिन मौजूद है।

रिबन पैराशूट तकनीक में भारत की मजबूती

इस सफल परीक्षण ने यह भी साबित किया कि भारत जटिल और ताकतवर रिबन पैराशूट के डिजाइन और निर्माण में आत्मनिर्भर होता जा रहा है।

ड्रोग पैराशूट का सही समय पर खुलना और अत्यधिक दबाव को सहन करना किसी भी मानवयुक्त मिशन के लिए अनिवार्य है। ऐसे में यह उपलब्धि तकनीकी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

क्या है गगनयान मिशन?

गगनयान मिशन भारत का पहला मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम है, जिसके तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लगभग 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजा जाएगा और फिर उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा।

लैंडिंग भारतीय समुद्री क्षेत्र में कराई जाएगी। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भारत सरकार अब तक लगभग 20,000 करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है। वहीं चालू वित्त वर्ष में अंतरिक्ष विभाग को 13,705 करोड़ रुपये का बजट दिया गया है।

ISRO का कहना है कि इस मिशन में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। ड्रोग पैराशूट क्वालिफिकेशन टेस्ट उसी दिशा में उठाया गया एक मजबूत और निर्णायक कदम है।

आगे अभी और कई परीक्षण बाकी

विशेषज्ञों के अनुसार, वास्तविक उड़ान से पहले सैकड़ों छोटे-बड़े परीक्षण किए जाएंगे। हर चरण में सुरक्षा, विश्वसनीयता और तकनीकी मजबूती को परखा जाएगा, ताकि भारत का पहला मानवीय अंतरिक्ष मिशन पूरी तरह सफल हो सके।

निष्कर्ष:

गगनयान मिशन ड्रोग पैराशूट क्वालिफिकेशन टेस्ट की सफलता ने भारत के मानव अंतरिक्ष अभियान को नई गति दी है। DRDO और ISRO की संयुक्त मेहनत ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में बड़े कदम उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

यदि आगे के परीक्षण भी इसी तरह सफल रहते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को स्वदेशी तकनीक के दम पर सुरक्षित अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रच देगा।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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