दिग्गज किसान नेता नाथूराम मिर्धा के बेटे भानुप्रकाश मिर्धा का निधन, 72 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस

जोधपुर: राजस्थान की राजनीति और किसान आंदोलन से जुड़े दिग्गज परिवार को गुरुवार को बड़ा आघात लगा है। वरिष्ठ किसान नेता स्वर्गीय नाथूराम मिर्धा के पुत्र और नागौर के पूर्व सांसद भानुप्रकाश मिर्धा का गुरुवार सुबह निधन हो गया। वे 72 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे।

परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, भानुप्रकाश मिर्धा ने गुरुवार सुबह करीब 10:45 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही प्रदेश के राजनीतिक गलियारों और किसान समाज में शोक की लहर दौड़ गई।


2 जनवरी को जोधपुर में होगा अंतिम संस्कार

भानुप्रकाश मिर्धा के पुत्र मनीष मिर्धा ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार 2 जनवरी को दोपहर 1 बजे जोधपुर में किया जाएगा। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में राजनीतिक, सामाजिक और किसान संगठनों से जुड़े लोग पहुंचने की संभावना है।


राजनीतिक सफर: चाचा को हराकर नागौर में पहली बार खिलाया ‘कमल’

भानुप्रकाश मिर्धा का जन्म 27 मार्च 1953 को हुआ था। वे 11वीं लोकसभा के सदस्य रहे। वर्ष 1996 में नाथूराम मिर्धा के निधन के बाद खाली हुई नागौर संसदीय सीट पर 1997 के उपचुनाव में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा।

इस चुनाव में उन्होंने अपने ही चाचा और कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामनिवास मिर्धा को हराकर नागौर में पहली बार भाजपा का ‘कमल’ खिलाया। यह जीत उस समय प्रदेश की राजनीति में बड़ी घटना मानी गई थी।

वे मूल रूप से नागौर के रहने वाले थे और लंबे समय तक किसान, ग्रामीण विकास और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहे। बाद के वर्षों में उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली थी।


श्रीगंगानगर से भी रहा पारिवारिक नाता

भानुप्रकाश मिर्धा का श्रीगंगानगर के प्रतिष्ठित सहारण परिवार से भी गहरा रिश्ता था। वे समाजसेवी व किसान नेता कृष्ण सहारण ‘मदेरां’, महेंद्र सहारण और साहबराम सहारण के बहनोई थे। उनके निधन पर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ क्षेत्र के किसान नेताओं ने भी गहरा शोक व्यक्त किया है।


परिवार

भानुप्रकाश मिर्धा अपने पीछे पत्नी इंद्रा मिर्धा, पुत्र मनीष मिर्धा और भास्कर मिर्धा, तथा दो पौत्रियां दिविजा और हिरण्या छोड़ गए हैं।


निष्कर्ष:

भानुप्रकाश मिर्धा का निधन राजस्थान की राजनीति और किसान आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति है। चाचा को हराकर संसद पहुंचने से लेकर किसान हितों की पैरवी तक उनका राजनीतिक सफर हमेशा याद किया जाएगा। उनके जाने से मिर्धा परिवार और किसान समाज में एक अपूरणीय खालीपन पैदा हो गया है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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