नई दिल्ली: ईरान के रणनीतिक रूप से अहम चाबहार पोर्ट को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर चाबहार पोर्ट से भारत का नियंत्रण छोड़ दिया है, जिससे देश के करीब 1100 करोड़ रुपये (120 मिलियन डॉलर) बर्बाद हो गए हैं।
कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि यह परियोजना भारत की जनता के पैसों से तैयार की गई थी, लेकिन अब सरकार की कथित कूटनीतिक कमजोरी के कारण यह निवेश बेकार चला गया।
हालांकि, कांग्रेस के इन आरोपों को विदेश मंत्रालय ने सिरे से खारिज कर दिया है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि चाबहार पोर्ट से जुड़ी सभी योजनाएं जारी हैं और भारत इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है।
अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद भारत को चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए एक विशेष प्रतिबंध छूट दी गई है। यह छूट 26 अप्रैल 2026 तक वैध है।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका ने भारत को अक्टूबर में छह महीने की अतिरिक्त छूट दी थी। रणधीर जायसवाल ने बताया कि 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत को पत्र भेजकर इस छूट से जुड़े दिशा-निर्देश साझा किए थे। भारत अब इन्हीं शर्तों के तहत अमेरिका से बातचीत कर रहा है, ताकि परियोजना में कोई बाधा न आए।
अमेरिका का मानना है कि ईरान बंदरगाहों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से मिलने वाली आय का इस्तेमाल अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में करता है। इसी वजह से 2018 में ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद अमेरिका ने ‘मैक्सिमम प्रेशर नीति’ अपनाई और चाबहार पोर्ट पर भी प्रतिबंध लगाए।
हालांकि, अफगानिस्तान और मध्य एशिया में मानवीय सहायता और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को देखते हुए भारत को सीमित छूट दी जाती रही है।
1. पाकिस्तान को बायपास कर सेंट्रल एशिया तक पहुंच
चाबहार के जरिए भारत बिना पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सामान भेज सकता है।
2. व्यापार और निर्यात में बढ़ोतरी
भारत के लिए दवाइयों, खाद्य सामग्री और औद्योगिक उत्पादों का निर्यात आसान होता है, साथ ही लॉजिस्टिक खर्च भी घटता है।
3. भारतीय निवेश की सुरक्षा
भारत ने इस परियोजना में भारी निवेश किया है, जो भविष्य में रणनीतिक और आर्थिक लाभ देगा।
4. चीन-पाकिस्तान गठजोड़ का जवाब
चाबहार, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के बेहद करीब है, जहां चीन निवेश कर रहा है। यह भारत के लिए एक अहम रणनीतिक काउंटर है।
2003: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में चाबहार पर बातचीत शुरू
2013: मनमोहन सिंह सरकार ने 800 करोड़ रुपये निवेश की घोषणा
2016: पीएम मोदी ने ईरान और अफगानिस्तान के साथ त्रिपक्षीय समझौता किया
2024: विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने ईरानी विदेश मंत्री से कनेक्टिविटी पर चर्चा
भारतीय कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के अनुसार, पूरा विकसित होने पर यह पोर्ट 82 मिलियन टन कार्गो संभाल सकेगा
चाबहार पोर्ट सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति, व्यापार और रणनीतिक सुरक्षा का अहम स्तंभ है। कांग्रेस और सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बीच सच्चाई यह है कि यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संतुलन से गहराई से जुड़ी हुई है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि भारत इस रणनीतिक मोर्चे पर अपनी पकड़ कितनी मजबूत बनाए रख पाता है।
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