लेखक: कर्नल देव आनंद लोहामरोड़
सुरक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ
इक्कीसवीं सदी: के तीसरे दशक में विश्व जिस तेज़ी से एक बार फिर महाशक्ति प्रतिस्पर्धा की ओर लौटता दिखाई दे रहा है, उसमें ग्रीनलैंड जैसे दूरस्थ, बर्फ़ से ढके और कम आबादी वाले द्वीप का अचानक वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ जाना कोई संयोग नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बार-बार यह कहना कि अमेरिका को ग्रीनलैंड “चाहिए” या “किसी न किसी तरह उसे हासिल करना होगा”, पहली नज़र में भले ही सनकी और अव्यावहारिक लगे, लेकिन इसके पीछे अमेरिकी रणनीतिक सोच का लंबा इतिहास और बदलता वैश्विक शक्ति-संतुलन साफ दिखाई देता है।
असल सवाल यह नहीं है कि ग्रीनलैंड बिकेगा या नहीं, क्योंकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ही इसे सिरे से खारिज कर चुके हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या दुनिया एक बार फिर प्रभाव-क्षेत्रों की राजनीति की ओर लौट रही है और क्या आर्कटिक क्षेत्र भविष्य का नया रणनीतिक रणक्षेत्र बनने जा रहा है।
भौगोलिक दृष्टि से ग्रीनलैंड उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और आर्कटिक महासागर तक पहुँच का एक प्राकृतिक प्रवेशद्वार है। शीत युद्ध के दौरान यह अमेरिकी मिसाइल चेतावनी प्रणाली और सामरिक निगरानी का अहम केंद्र रहा। आज जलवायु परिवर्तन के कारण जब आर्कटिक की बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है, नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुँच आसान हो रही है, तब इस क्षेत्र का सामरिक और आर्थिक महत्व कई गुना बढ़ चुका है।
आर्कटिक क्षेत्र में संभावित रेयर अर्थ एलिमेंट्स, तेल और गैस भंडार, और नए व्यापारिक समुद्री मार्ग वैश्विक शक्तियों के लिए अत्यंत आकर्षक बन चुके हैं। यही कारण है कि यह क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।
अमेरिका की ग्रीनलैंड में रुचि कोई नई बात नहीं है। 1867 में अलास्का की खरीद के समय से ही अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने ग्रीनलैंड और आइसलैंड को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच समुद्री और हवाई मार्गों की सुरक्षा के लिए अहम चौकी बना।
द्वितीय विश्व युद्ध में नाज़ी जर्मनी द्वारा डेनमार्क पर कब्ज़े के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड को जर्मन प्रभाव से बचाने के लिए वहाँ सैन्य उपस्थिति स्थापित की। शीत युद्ध के दौर में 1951 के रक्षा समझौते के तहत बना अमेरिकी एयर बेस, आज का पिटुफिक स्पेस बेस, सोवियत मिसाइल गतिविधियों की निगरानी का प्रमुख केंद्र रहा। इस तरह, कानूनी रूप से भले ही ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन रहा हो, लेकिन रणनीतिक रूप से वह दशकों से अमेरिकी सुरक्षा तंत्र का हिस्सा रहा है।
1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन द्वारा ग्रीनलैंड खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव इस रणनीतिक सोच का स्पष्ट उदाहरण है। भले ही यह प्रस्ताव ठुकरा दिया गया हो, लेकिन अमेरिका की दीर्घकालिक दिलचस्पी कभी खत्म नहीं हुई।
आज आर्कटिक की राजनीति को तीन बड़े कारक दिशा दे रहे हैं। पहला, जलवायु परिवर्तन, जिसने क्षेत्र को आर्थिक रूप से सुलभ बना दिया है। दूसरा, चीन का उदय, जो स्वयं को “नियर-आर्कटिक स्टेट” कहकर वैज्ञानिक, आर्थिक और दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति बढ़ा रहा है। तीसरा, रूस, जो आर्कटिक को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का अभिन्न हिस्सा मानते हुए वहाँ सैन्य ढांचे को मजबूत कर रहा है।
इन्हीं परिस्थितियों में ट्रंप के ग्रीनलैंड संबंधी बयान सामने आते हैं। 2019 में उनकी “खरीद” वाली टिप्पणी को दुनिया ने मज़ाक समझा, लेकिन दूसरे कार्यकाल में उनका रुख कहीं अधिक आक्रामक हो गया। जनवरी 2026 में उन्होंने ग्रीनलैंड मुद्दे पर विरोध करने वाले देशों पर खुले आर्थिक दबाव की घोषणा कर दी।
17 जनवरी 2026 को अमेरिका ने डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंड्स सहित कई यूरोपीय देशों के उत्पादों पर 1 फरवरी से 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की घोषणा की, जिसे जून 2026 से 25 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। यह कदम ग्रीनलैंड पर अमेरिकी रणनीति के खिलाफ यूरोपीय रुख का सीधा जवाब माना जा रहा है।
यूरोपीय देशों ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड कोई बिकाऊ संपत्ति नहीं है और उसकी संप्रभुता पर कोई समझौता संभव नहीं। यह विवाद अब केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि ट्रांस-अटलांटिक व्यापार और कूटनीतिक टकराव का रूप ले चुका है।
हालाँकि यह भी तथ्य है कि अभी तक चीन या रूस द्वारा ग्रीनलैंड पर सीधे कब्ज़े की कोई ठोस योजना सामने नहीं आई है। उनकी रुचि मुख्यतः समुद्री मार्गों, संसाधनों और दीर्घकालिक प्रभाव तक सीमित है। फिर भी अमेरिका इसे संभावित भविष्यगत खतरे के रूप में देख रहा है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने दो टूक कहा है कि ग्रीनलैंड का भविष्य वहाँ के लोगों की इच्छा से तय होगा। स्वतंत्रता की भावना मौजूद है, लेकिन वह किसी दूसरी महाशक्ति के अधीन जाने की नहीं, बल्कि आत्मनिर्णय की आकांक्षा से जुड़ी है। नाटो के सदस्य के रूप में डेनमार्क पहले ही सामूहिक सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है, जिससे ग्रीनलैंड की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल एक द्वीप या आर्कटिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक बदलाव का प्रतीक है, जहाँ नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था धीरे-धीरे कमजोर होती दिख रही है और उसकी जगह शक्ति-आधारित राजनीति लौट रही है। यदि संप्रभुता, आत्मनिर्णय और सहयोग जैसे सिद्धांत कमजोर पड़ते हैं, तो यह केवल यूरोप या अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अस्थिरता का संकेत होगा। ग्रीनलैंड आज उसी उभरती हुई, अनिश्चित और प्रतिस्पर्धी विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन चुका है।
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