दौसा में ‘एक्स-रे घोटाला’ का भंडाफोड़: फर्जी सिलिकोसिस सर्टिफिकेट से 12.39 करोड़ की ठगी, 2 डॉक्टर-1 रेडियोग्राफर गिरफ्तार

राजस्थान: के दौसा जिले से एक बड़ा स्वास्थ्य घोटाला सामने आया है, जिसने सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी के नाम पर फर्जी सर्टिफिकेट जारी कर करोड़ों रुपए की ठगी करने के मामले में पुलिस ने दो डॉक्टरों और एक रेडियोग्राफर को गिरफ्तार किया है। यह घोटाला न सिर्फ आर्थिक अपराध है, बल्कि असली मरीजों के हक पर भी सीधा हमला माना जा रहा है।

पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने 413 फर्जी सिलिकोसिस प्रमाण-पत्र जारी कर सरकार को करीब 12.39 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल में एक ही एक्स-रे का बार-बार इस्तेमाल कर अलग-अलग मरीजों के नाम पर सर्टिफिकेट जारी किए जाते थे।

कैसे हुआ घोटाले का खुलासा?

यह मामला तब सामने आया जब सिलिकोसिस कार्ड बनाने के आंकड़ों में असामान्य वृद्धि देखी गई। नवंबर 2022 से शुरू हुई ऑनलाइन प्रक्रिया में दौसा जिले में मात्र 10 महीनों में 2453 कार्ड बनाए गए, जो पूरे प्रदेश का लगभग 46 प्रतिशत था। इतनी बड़ी संख्या ने जांच एजेंसियों को सतर्क कर दिया।

इसके बाद राज्य स्तर पर जांच कमेटियां गठित की गईं, जिनमें जयपुर के मेडिकल विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन की टीम शामिल थी। जांच में सामने आया कि कई मामलों में मरीजों को सिलिकोसिस था ही नहीं, फिर भी उन्हें प्रमाण-पत्र जारी कर दिए गए।

फर्जीवाड़े का तरीका बेहद चौंकाने वाला

जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि रेडियोग्राफर द्वारा अपलोड किए गए एक्स-रे में भारी गड़बड़ी थी। एक ही एक्स-रे को बार-बार अलग-अलग मरीजों के नाम से अपलोड किया जाता था। इसके आधार पर डॉक्टर फर्जी रिपोर्ट तैयार कर देते थे और सिस्टम से ऑटो अप्रूवल के जरिए सर्टिफिकेट जारी हो जाते थे।

इस पूरे नेटवर्क में डॉक्टरों, रेडियोग्राफरों और अन्य कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई है। प्रदेशभर में इस मामले में 22 लोगों के शामिल होने की बात सामने आई, जिनमें से 13 अकेले दौसा जिले से हैं।

पहली गिरफ्तारी, आगे और खुलासे संभव

करीब दो साल से चल रही जांच में यह पहली बड़ी कार्रवाई है। पुलिस ने डॉ. मनोज ऊंचवाल, डॉ. डीएन शर्मा और रेडियोग्राफर मनोहर लाल को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया।

पुलिस का कहना है कि बाकी आरोपियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है और जल्द ही और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। फिलहाल 19 अन्य संदिग्धों को एपीओ (Awaiting Posting Orders) किया गया है।

सरकारी योजना का कैसे हुआ दुरुपयोग?

राज्य सरकार ने 2019 में सिलिकोसिस नीति लागू की थी, जिसके तहत इस बीमारी से पीड़ित मरीजों को आर्थिक सहायता दी जाती है।

  • मरीज को 3 लाख रुपए
  • मृत्यु पर परिवार को 2 लाख रुपए
  • अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपए
  • हर महीने 1500 रुपए पेंशन

इसी योजना का फायदा उठाकर आरोपियों ने फर्जी सर्टिफिकेट बनाकर करोड़ों रुपए का भुगतान हासिल किया।

असली मरीजों के साथ अन्याय

इस घोटाले का सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन लोगों को वास्तव में सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी थी, उनके आवेदन कई बार खारिज कर दिए गए। जबकि स्वस्थ लोगों के नाम पर फर्जी सर्टिफिकेट बनाकर सरकारी धन निकाला गया।

सिलिकोसिस क्या है?

सिलिकोसिस एक गंभीर फेफड़ों की बीमारी है, जो मुख्य रूप से खदानों और धूल भरे वातावरण में काम करने वाले मजदूरों को होती है। सिलिका धूल के लगातार संपर्क में रहने से फेफड़े धीरे-धीरे खराब हो जाते हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत और अन्य गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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