जयपुर: में सियासी हलचल के बीच राधामोहन दास अग्रवाल का एक बड़ा बयान सामने आया है, जिसने मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है। बीजेपी के प्रदेश प्रभारी ने साफ शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी में मुख्यमंत्री भी संगठन से बड़ा नहीं होता और सभी निर्णय एक तय प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
मंगलवार को प्रदेश बीजेपी कार्यालय में मीडिया से बातचीत करते हुए अग्रवाल ने यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अंतिम निर्णय राष्ट्रीय नेतृत्व का होता है, भले ही मुख्यमंत्री इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हों।
अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि बीजेपी में कोई भी फैसला एक व्यक्ति के स्तर पर नहीं होता। उन्होंने कहा, “हमारे यहां मुख्यमंत्री सारे निर्णय अकेले नहीं लेते हैं। जब उन्हें लगता है कि मंत्रिमंडल में बदलाव या विस्तार की जरूरत है, तब वे राष्ट्रीय अध्यक्ष से चर्चा करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों का लगातार मूल्यांकन करते रहते हैं और जब उन्हें लगता है कि बदलाव जरूरी है, तभी इस दिशा में कदम उठाया जाता है।
अग्रवाल के इस बयान को बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे का स्पष्ट संदेश माना जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में संगठन सर्वोपरि है और हर निर्णय उसी के अनुरूप लिया जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान उन अटकलों के बीच आया है, जिनमें कहा जा रहा था कि राजस्थान में जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है।
इस दौरान अग्रवाल ने विपक्षी दल कांग्रेस पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने अशोक गहलोत के “इंतजार शास्त्र” वाले बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस के अंदरूनी विवादों को छिपाने के लिए बीजेपी पर निशाना साधा जा रहा है।
उन्होंने कहा, “यह उनकी आंतरिक लड़ाई है। वे किसी और पर निशाना साधते हैं, लेकिन असल में हमला अपने ही संगठन के अंदर किसी और पर होता है।”
अग्रवाल ने कांग्रेस सरकार के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय खुद उनके उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच टकराव की स्थिति थी। उन्होंने कहा कि अंततः हालात ऐसे बने कि तत्कालीन मुख्यमंत्री को अपने ही डिप्टी सीएम को पद से हटाना पड़ा।
यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी और नेतृत्व संकट को उजागर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि अग्रवाल ने मंत्रिमंडल विस्तार की कोई स्पष्ट तारीख या संकेत नहीं दिया, लेकिन उनके बयान से यह जरूर स्पष्ट हुआ कि इस पर निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार अपने कामकाज से संतुष्ट है, तो विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन जब जरूरत महसूस होगी, तब उचित प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाएगा।
राजस्थान की राजनीति में यह बयान कई मायनों में अहम माना जा रहा है। एक ओर यह पार्टी के भीतर अनुशासन और संगठन की प्राथमिकता को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह संकेत भी देता है कि मुख्यमंत्री की भूमिका महत्वपूर्ण होने के बावजूद अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में है।
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