नई दिल्ली। देश में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर सियासत तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि महिला आरक्षण बिल की मंशा साफ नहीं है और यह केवल चुनावी फायदा लेने का प्रयास है।
विपक्षी दलों की बैठक के बाद खरगे ने स्पष्ट किया कि विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि सरकार जिस तरीके से इसे लागू करना चाहती है, उस पर गंभीर आपत्ति है।
खरगे ने कहा, “हम सभी महिला आरक्षण के समर्थन में हैं। कांग्रेस ने हमेशा इस बिल का समर्थन किया है, लेकिन सरकार ने इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर इसे लागू करने में अनावश्यक देरी का रास्ता तैयार कर दिया है।”
उनका आरोप है कि सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है, ताकि चुनावों में लाभ उठाया जा सके।
विपक्ष का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि महिला आरक्षण को लागू करने से पहले जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन अनिवार्य किया गया है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि यह एक “खतरनाक प्रक्रिया” है, जिससे कई राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है। उनका मानना है कि इन शर्तों के कारण यह कानून लंबे समय तक लागू नहीं हो पाएगा।
जयराम रमेश ने साफ कहा कि महिलाओं को आरक्षण का लाभ तुरंत मिलना चाहिए और इसे मौजूदा 543 लोकसभा सीटों के आधार पर लागू किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन आयोग का इस्तेमाल पहले भी राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है, जैसे जम्मू-कश्मीर और असम के मामलों में देखा गया।
विपक्ष की एक और बड़ी मांग यह है कि 33% महिला आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग से कोटा सुनिश्चित किया जाए।
विपक्षी दलों का कहना है कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो आरक्षण का लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट जाएगा और सामाजिक न्याय का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
दक्षिण भारत के कई विपक्षी दलों ने भी इस प्रस्ताव पर चिंता जताई है। उनका मानना है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाले परिसीमन से उत्तर भारत की सीटें बढ़ जाएंगी, जबकि दक्षिणी राज्यों की सीटें अपेक्षाकृत कम हो सकती हैं।
इससे उनके राजनीतिक प्रभाव में कमी आ सकती है, जो संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है।
एक ओर केंद्र सरकार इस बिल को महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “चुनावी स्टंट” करार दे रहा है।
खरगे ने आरोप लगाया कि सरकार कार्यपालिका के जरिए संविधान की शक्तियों को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रही है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा है।
विपक्ष ने संकेत दिया है कि वह संसद में इस बिल के मौजूदा स्वरूप का पुरजोर विरोध करेगा। साथ ही, सरकार पर दबाव बनाया जाएगा कि वह बिना देरी के महिला आरक्षण लागू करे और विवादित शर्तों को हटाए।
महिला आरक्षण बिल पर जारी यह सियासी टकराव साफ करता है कि मुद्दा केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके का है। जहां एक ओर महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देने की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर प्रक्रियात्मक शर्तों को लेकर गहरी असहमति है। आने वाले समय में संसद में इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल सकता है।
All Rights Reserved & Copyright © 2015 By HP NEWS. Powered by Ui Systems Pvt. Ltd.