दौसा में ‘साइलेंट किलर’ का खतरा? सिलिकोसिस पर केंद्रीय टीम का छापा-जैसा दौरा, स्टोन यूनिटों में क्या मिला?

राजस्थान: के दौसा जिले में फैल रही सिलिकोसिस बीमारी ने एक बार फिर प्रशासन और केंद्र सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मंगलवार को केंद्रीय टीम ने सिकराय क्षेत्र का दौरा कर जमीनी हकीकत का आकलन किया। इस दौरान टीम ने मानपुर, कालवान और सीकरी में संचालित स्टोन कटिंग और क्रेशर यूनिटों का निरीक्षण किया, मरीजों और श्रमिकों से बातचीत की तथा सरकारी सहायता योजनाओं की स्थिति का फीडबैक लिया।

यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्र में सिलिकोसिस के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता गहराती जा रही है।

किन-किन इलाकों में हुआ निरीक्षण?

केंद्रीय टीम ने Dausa जिले के Sikrai उपखंड के अंतर्गत आने वाले मानपुर, कालवान और सीकरी गांवों का दौरा किया।

टीम में Central Pollution Control Board के एडिशनल डायरेक्टर अजीत विद्यार्थी और भोपाल से आए विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. अनूप चतुर्वेदी शामिल थे। उनके साथ स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, श्रम विभाग और प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारी भी मौजूद रहे।

स्टोन यूनिटों और क्रेशर का निरीक्षण

सबसे पहले टीम ने मानपुर में संचालित स्टोन कटिंग यूनिटों का निरीक्षण किया। यहां पत्थर काटने और घिसाई के दौरान उठने वाली धूल को लेकर सुरक्षा उपायों की समीक्षा की गई।

इसके बाद कालवान और सीकरी में क्रेशर यूनिटों का जायजा लिया गया। टीम ने संचालकों से सीधे सवाल किए—क्या श्रमिकों को मास्क और सेफ्टी गियर दिया जा रहा है? क्या नियमित हेल्थ चेकअप हो रहे हैं? क्या धूल नियंत्रण के लिए पानी का छिड़काव या अन्य तकनीकी उपाय अपनाए जा रहे हैं?

हालांकि, कुछ यूनिटों पर टीम के पहुंचने के समय मजदूर मौजूद नहीं मिले, जिससे वास्तविक कार्य परिस्थितियों का आकलन सीमित रह गया।

मरीजों से सीधी बातचीत

दौरे का अहम हिस्सा रहा—सिलिकोसिस से प्रभावित मरीजों से मुलाकात। टीम ने मरीजों के घर जाकर उनकी स्वास्थ्य स्थिति, इलाज की उपलब्धता और सरकारी सहायता राशि के बारे में जानकारी ली।

कई श्रमिकों ने बताया कि उन्हें लगातार खांसी, सांस फूलना और कमजोरी जैसी समस्याएं हैं। कुछ ने यह भी कहा कि बीमारी का पता देर से चलता है, तब तक फेफड़ों को गंभीर नुकसान हो चुका होता है।

टीम ने पूछा कि क्या उन्हें समय पर मुआवजा मिला? क्या इलाज के लिए पर्याप्त सहायता मिल रही है? क्या परिवार को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिला?

सरकारी सहायता और फीडबैक

राज्य सरकार की ओर से सिलिकोसिस पीड़ितों को आर्थिक सहायता और पेंशन जैसी योजनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। केंद्रीय टीम ने इन योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति जानी।

संचालकों से भी सुझाव मांगे गए कि बीमारी की रोकथाम के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाए जा सकते हैं। कुछ संचालकों ने तकनीकी सहायता और धूल नियंत्रण उपकरणों पर सब्सिडी की मांग की।

तीन दिन का दौरा, दस दिन में रिपोर्ट

केंद्रीय टीम का यह दौरा तीन दिनों तक चलेगा। बुधवार को भी टीम प्रभावित गांवों का दौरा करेगी और विस्तृत आंकड़े एकत्र करेगी।

दौरे के बाद 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी जाएगी, जिसमें क्षेत्र की वास्तविक स्थिति, जोखिम स्तर और सुधार के सुझाव शामिल होंगे।

सिलिकोसिस क्या है और क्यों खतरनाक?

सिलिकोसिस एक फेफड़ों की गंभीर बीमारी है, जो लंबे समय तक सिलिका धूल के संपर्क में रहने से होती है। पत्थर कटिंग, खनन और क्रेशर उद्योग में काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक जोखिम में होते हैं।

इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है। समय पर पहचान और धूल से बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय माने जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, कार्यस्थल पर धूल नियंत्रण, नियमित स्वास्थ्य जांच और सुरक्षा उपकरणों का अनिवार्य उपयोग ही इसके मामलों को कम कर सकता है।

प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका

दौरे के दौरान जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. रविशंकर नागर, सिकराय बीसीएमओ डॉ. मनोज मीना, सिकंदरा बीसीएमओ डॉ. ओमप्रकाश सैनी, डॉ. रवि मीणा और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी बलवंत सिंह गुर्जर सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

अधिकारियों ने बताया कि प्रभावित श्रमिकों की पहचान कर उन्हें चिकित्सा सुविधा और सहायता राशि उपलब्ध कराई जा रही है।

हालांकि, सामाजिक संगठनों का कहना है कि वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से अधिक हो सकती है।

श्रमिकों की चुनौतियां

कई श्रमिक आर्थिक मजबूरी के कारण जोखिम भरे काम में लगे रहते हैं। सुरक्षा उपकरणों की कमी, जागरूकता का अभाव और असंगठित क्षेत्र की चुनौतियां स्थिति को और जटिल बनाती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा; दीर्घकालिक नीति, सख्त प्रवर्तन और वैकल्पिक रोजगार अवसर भी जरूरी हैं।

क्या बदलेगी स्थिति?

केंद्रीय टीम की रिपोर्ट पर आगे की कार्रवाई निर्भर करेगी। यदि रिपोर्ट में गंभीर लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित यूनिटों पर कार्रवाई संभव है।

साथ ही, श्रमिकों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, नियमित स्क्रीनिंग और धूल नियंत्रण उपायों को अनिवार्य बनाने की सिफारिश की जा सकती है।


निष्कर्ष

दौसा जिले के सिकराय क्षेत्र में सिलिकोसिस का मुद्दा केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि श्रमिक सुरक्षा और औद्योगिक जवाबदेही का सवाल भी है। केंद्रीय टीम का दौरा स्थिति को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वास्तविक बदलाव तभी संभव है जब निरीक्षण के बाद ठोस कार्रवाई हो।

श्रमिकों की सुरक्षा, नियमित स्वास्थ्य जांच और प्रभावी धूल नियंत्रण उपायों के बिना इस ‘साइलेंट किलर’ पर काबू पाना मुश्किल होगा। आने वाले दिनों में टीम की रिपोर्ट पर सबकी नजर रहेगी।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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