जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल में डॉक्टरों ने एक बेहद जटिल और दुर्लभ सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर 11 वर्षीय बच्चे को नई जिंदगी दी है। जन्म से ही डायफ्राम में छेद होने के कारण बच्चे का लीवर, गॉल ब्लैडर और आंतों का बड़ा हिस्सा सीने में पहुंच गया था, जिससे उसका एक फेफड़ा लगभग सिकुड़ गया था और उसे सांस लेने में गंभीर परेशानी हो रही थी।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार यह मामला डायफ्रामेटिक हर्निया नामक दुर्लभ जन्मजात बीमारी का था। बच्चे का इलाज जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल (SMS) के सर्जरी विभाग में किया गया।
एसएमएस अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. दीपक माहेश्वरी ने बताया कि यह बच्चा अलवर जिले का रहने वाला है। जन्म से ही उसके शरीर में डायफ्राम में छेद था, लेकिन शुरुआती वर्षों में इसके लक्षण ज्यादा स्पष्ट नहीं थे।
हालांकि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा हुआ, उसकी परेशानी बढ़ती चली गई। थोड़ा चलने, खेलने-कूदने या सीढ़ियां चढ़ने पर उसे सांस फूलने लगती थी। पिछले कुछ महीनों में उसकी हालत और ज्यादा खराब हो गई थी, जिसके बाद परिवार उसे इलाज के लिए एसएमएस अस्पताल लेकर आया।
अस्पताल की ओपीडी में जांच के दौरान डॉक्टरों ने बच्चे का सीटी स्कैन और अन्य जरूरी मेडिकल टेस्ट करवाए। जांच रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर भी हैरान रह गए।
सर्जरी विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. जीवन कांकरिया ने बताया कि बच्चे के डायफ्राम में मौजूद छेद के कारण पेट के कई महत्वपूर्ण अंग अपनी जगह से खिसककर सीने में पहुंच गए थे।
उन्होंने बताया कि बच्चे के शरीर में:
लगभग 70 प्रतिशत लीवर
गॉल ब्लैडर
और आंतों का बड़ा हिस्सा
सीने के दाहिने हिस्से में चला गया था।
इसके कारण बच्चे का दाहिना फेफड़ा दबकर लगभग सिकुड़ गया था। यही वजह थी कि वह सामान्य तरीके से सांस नहीं ले पा रहा था और उसे थोड़ी सी शारीरिक गतिविधि में भी सांस फूलने लगती थी।
डॉक्टरों के मुताबिक डायफ्रामेटिक हर्निया एक दुर्लभ जन्मजात बीमारी है। इसमें पेट और सीने को अलग करने वाली झिल्ली यानी डायफ्राम में छेद हो जाता है।
आमतौर पर यह बीमारी शरीर के बाईं तरफ ज्यादा पाई जाती है, लेकिन इस बच्चे में यह समस्या दाहिनी तरफ थी, जो बहुत कम मामलों में देखने को मिलती है। यही वजह थी कि यह सर्जरी और भी चुनौतीपूर्ण बन गई।
डॉक्टरों की टीम ने बच्चे की हालत को देखते हुए सर्जरी करने का फैसला किया। यह ऑपरेशन लैप्रोस्कोपिक यानी दूरबीन तकनीक से किया गया।
सर्जरी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती उन सभी अंगों को वापस उनकी सही जगह पर लाना था जो सीने में चले गए थे।
ऑपरेशन के लिए डॉक्टरों ने केवल तीन छोटे छेद किए—
एक 10 मिमी का
और दो 5 मिमी के
इन्हीं छोटे छेदों के माध्यम से करीब दो घंटे तक चली सर्जरी में लीवर, गॉल ब्लैडर और आंतों को सावधानीपूर्वक वापस पेट में स्थापित किया गया।
सर्जरी के दौरान डॉक्टरों ने बच्चे के सिकुड़े हुए फेफड़े को फुलाकर उसकी कार्यक्षमता की भी जांच की। जब यह सुनिश्चित हो गया कि फेफड़ा सही तरीके से काम कर रहा है, तब डायफ्राम के छेद को विशेष मेडिकल मेश (जाली) लगाकर मजबूती से बंद कर दिया गया।
इस जटिल सर्जरी को सफल बनाने में सर्जरी विभाग के डॉ. जीवन कांकरिया के साथ डॉ. बुगालिया, डॉ. गरिमा, डॉ. अनिल और डॉ. मेकला की अहम भूमिका रही।
वहीं एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. सुशील भाटी, डॉ. सुनील चौहान, डॉ. इंदु और डॉ. मनोज सोनी ने भी ऑपरेशन के दौरान महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
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