“17 अप्रैल काला दिवस!”—अन्नपूर्णा देवी का बड़ा हमला, महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम तेज

उत्तर प्रदेश: की राजधानी लखनऊ में आयोजित एक अहम प्रेसवार्ता में महिला आरक्षण बिल को लेकर सियासत एक बार फिर गरमा गई। केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोलते हुए 17 अप्रैल को “काला दिवस” करार दिया। उनका कहना था कि इस दिन संसद में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा मौका गंवा दिया गया।

प्रेसवार्ता भाजपा कार्यालय में आयोजित की गई थी, जहां अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि सरकार अब महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करने की दिशा में ठोस कदम उठा रही थी, लेकिन विपक्षी दलों ने इस प्रयास को बाधित किया।

उन्होंने विशेष रूप से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके पर आरोप लगाया कि इन दलों ने “लटकाओ, भटकाओ और अटकाओ” की राजनीति करते हुए नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित होने से रोका।

अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि संसद में इस विधेयक पर चर्चा सकारात्मक रही, लेकिन जब निर्णय का समय आया, तो विपक्ष ने महिलाओं की आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं अब जागरूक हैं और अपने अधिकारों के लिए खड़ी होना जानती हैं। आने वाले समय में वे लोकतांत्रिक तरीके से इसका जवाब देंगी।

केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष के प्रमुख नेताओं पर भी सीधा निशाना साधा। राहुल गांधी को घेरते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को उनका हक नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का काम एनडीए सरकार ने किया, जो सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

इसके साथ ही उन्होंने अखिलेश यादव पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, लेकिन कुछ दल वोट बैंक की राजनीति के चलते इस सिद्धांत को नजरअंदाज करते हैं।

अन्नपूर्णा देवी ने परिवारवाद को भी मुद्दा बनाते हुए कहा कि विपक्षी दलों के कई नेता केवल अपने परिवार के हितों के लिए राजनीति करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन दलों को देश की आम जनता और विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों से कोई सरोकार नहीं है।

इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रिया तेज हो गई है। विपक्षी दलों का कहना है कि महिला आरक्षण बिल को लेकर उनकी आपत्तियां प्रक्रिया और कार्यान्वयन से जुड़ी थीं, न कि महिलाओं के अधिकारों के विरोध में। उनका तर्क है कि बिना सही परिसीमन और जनगणना के इस तरह के कानून का प्रभावी क्रियान्वयन संभव नहीं होगा।

हालांकि, भाजपा और उसके सहयोगी दल इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रहे हैं और विपक्ष पर इसे रोकने का आरोप लगा रहे हैं। इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक ध्रुवीकरण को तेज कर दिया है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के सामने हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या महिला आरक्षण का मुद्दा चुनावी एजेंडा बनेगा और क्या इस पर कोई सर्वसम्मति बन पाएगी। फिलहाल, 17 अप्रैल की घटना ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।


निष्कर्ष:

महिला आरक्षण बिल को लेकर जारी विवाद ने यह साफ कर दिया है कि यह केवल एक विधायी मुद्दा नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक असहमति का विषय बन चुका है। जहां सत्ता पक्ष इसे महिलाओं के अधिकार की लड़ाई बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे अधूरा और जल्दबाजी में लाया गया कदम मान रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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