मामला बाड़मेर जिले की ग्राम पंचायत मोतीनगरी के वार्ड नंबर 02 की मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने 15 अक्टूबर 2026 को जारी प्रशासनिक आदेश को चुनौती देते हुए उसे गलत बताया था। उनका कहना था कि उनके पास अपने पक्ष में पर्याप्त दस्तावेज मौजूद हैं।
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से बताया गया कि पंचायती राज चुनावों का कार्यक्रम 3 अक्टूबर 2026 को घोषित किया जा चुका है। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 243-O का हवाला देते हुए दलील दी कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
आयोग के अनुसार, चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद मतदाता सूचियों में बदलाव की अनुमति देने से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और निर्धारित कार्यक्रम में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के एन.पी. पन्नुस्वामी और मोहिंदर सिंह गिल से जुड़े फैसलों का उल्लेख किया। इन फैसलों में चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं और चुनावी मामलों में न्यायालयों द्वारा बरते जाने वाले संयम के सिद्धांतों पर विचार किया गया है।
अदालत ने इन कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
इस मामले से यह संदेश सामने आया है कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद मतदाता सूची से जुड़े विवादों में न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक सीमाओं और लागू कानूनी प्रावधानों के अधीन होगा। हालांकि, इसे हर परिस्थिति में मतदाता सूची से जुड़े किसी भी विवाद पर अदालत के हस्तक्षेप की पूर्ण मनाही के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
राजस्थान में आगामी पंचायती राज चुनावों के मद्देनजर यह फैसला चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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