वर्ष 2020 के चुनाव में भाजपा के 139 पार्षद विजयी हुए थे। इनमें से इस बार केवल 24 पार्षदों को दोबारा टिकट मिला है। वहीं 115 पूर्व पार्षदों का टिकट काट दिया गया।
कांग्रेस की स्थिति भी लगभग ऐसी ही रही। 2020 में कांग्रेस के 88 पार्षद चुनाव जीते थे, लेकिन इस बार इनमें से सिर्फ 16 को फिर से टिकट दिया गया। पार्टी ने 72 पुराने पार्षदों को टिकट नहीं दिया।
2020 में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल करने वाले 23 पार्षदों में से केवल तीन को इस बार प्रमुख दलों ने टिकट दिया है। इनमें दो को भाजपा और एक को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया है।
इस तरह 2020 में जीतने वाले कुल 250 पार्षदों में से सिर्फ 17.2 प्रतिशत को ही दोबारा टिकट मिल सका है।
इतने बड़े बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह वार्डों का परिसीमन और नगर निगमों का पुनर्गठन भी माना जा रहा है। वर्ष 2020 में जयपुर में ग्रेटर और हेरिटेज नगर निगम अलग-अलग थे और कुल 250 वार्ड थे। अब चुनाव 150 वार्डों के लिए हो रहे हैं।
परिसीमन के बाद कई वार्डों की सीमाएं बदल गई हैं। पुराने वार्डों के इलाके अलग-अलग नए वार्डों में चले गए हैं। ऐसे में कई पूर्व पार्षदों का पुराना चुनावी समीकरण और क्षेत्रीय आधार प्रभावित हुआ है।
पांच साल के कार्यकाल के बाद कई मौजूदा और पूर्व पार्षदों को स्थानीय स्तर पर जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ा। इसके चलते भाजपा और कांग्रेस दोनों पर नए चेहरों को मौका देने का दबाव बढ़ा।
दोनों दलों की रणनीति अब युवा और सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे लाने तथा पुराने चेहरों की जगह नई टीम के साथ चुनाव मैदान में उतरने की दिखाई दे रही है।
जयपुर नगर निगम का चुनाव राजधानी होने के कारण राजस्थान की राजनीति में खास महत्व रखता है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस द्वारा इतने बड़े स्तर पर पुराने पार्षदों के टिकट काटना चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नए चेहरों पर दोनों दलों का दांव कितना सफल रहता है और टिकट कटने वाले पुराने पार्षदों में से कितने बागी होकर चुनाव मैदान में उतरते हैं। नाम वापसी के बाद जयपुर के चुनावी मुकाबले की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट होगी।
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